पाठ्यक्रम: जीएस- 2 / शासन; जीएस-3 / जल संरक्षण
सन्दर्भ
- केंद्रीय जल आयोग द्वारा जारी नवीनतम आँकड़ों में देश के 166 जलाशयों और 20 नदी बेसिनों में जल स्तर में तीव्र गिरावट दर्ज की गई है।
परिचय
- भारत के प्रमुख जलाशयों में जल स्तर कुल क्षमता के 40% से नीचे आ गया है।
- कई जलाशय अत्यंत निम्न या शून्य स्तर तक पहुँच गए हैं;चंदन बाँध पूर्णतः सूख चुका है।
- अधिकांश 20 नदी बेसिन 30% से 60% क्षमता के बीच संचालित हो रहे हैं, जबकि कुछ ही इससे अधिक स्तर पर हैं।
- दक्षिण भारत में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है, जिससे ग्रीष्मकाल से पूर्व जल संकट की आशंका बढ़ गई है।
- दक्षिण भारत के 36 जलाशय 40% से नीचे हैं, जो देश में सर्वाधिक है।
- समग्र रूप से, आँकड़े जल स्तर में व्यापक गिरावट दर्शाते हैं, विशेषकर दक्षिण और पश्चिम भारत में ग्रीष्मकालीन जल संकट का जोखिम बढ़ रहा है।
जलाशय
- जलाशय वे प्राकृतिक या कृत्रिम भंडारण स्थल हैं जहाँ जल को भविष्य के उपयोग हेतु एकत्रित किया जाता है।
- इनमें नदियाँ, झीलें, हिमनद, भूजल भंडार, बाँध जलाशय, तालाब और नहरें शामिल हैं।
- ये विभिन्न उद्देश्यों के लिए जल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्षमता में कमी के कारण
- गाद जमाव (Siltation): समय के साथ गाद और मलबे के जमा होने से भंडारण क्षमता घटती है।
- जलागम क्षेत्र का क्षरण: वनों की कटाई, खनन और अत्यधिक चराई से मृदा अपरदन बढ़ता है तथा गाद का प्रवाह बढ़ता है।
- अतिक्रमण और शहरीकरण: जलाशयों तथा जल आपूर्ति मार्गों पर अवैध कब्ज़ा प्रभावी भंडारण को कम करता है।
- पोषक तत्व प्रदूषण एवं जलीय खरपतवार: अत्यधिक पोषक तत्वों के कारण शैवाल और खरपतवार की वृद्धि से स्थान घिर जाता है।
- जलवायु परिवर्तनशीलता: अनियमित वर्षा और सूखे की स्थिति जल प्रवाह को घटाती है तथा गाद जमाव को बढ़ाती है।
भारत में जल संकट
- भारत के पास विश्व की 18% जनसंख्या है, जबकि केवल 4% मीठा जल उपलब्ध है।
- विश्व बैंक ने भारत को जल-संकटग्रस्त देशों में शामिल किया है।
- बढ़ती मांग, कुप्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के कारण 2040 तक कई क्षेत्रों में गंभीर जल संकट की आशंका है।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड की वर्ष 2024 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भूजल दोहन का औसत स्तर 60.4% है।
जल संकट के प्रमुख कारण
- तीव्र शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण जल स्रोतों का प्रदूषण बढ़ा है।
- कृषि में अक्षम पद्धतियाँ तथा अत्यधिक भूजल दोहन से जल स्रोतों का क्षय हुआ है।
- जलवायु परिवर्तन से वर्षा का स्वरूप अनियमित हो गया है और जल पुनर्भरण प्रभावित हुआ है।
- जल प्रबंधन की कमी और अपर्याप्त आधारभूत संरचना भी संकट को बढ़ाती है।
भारत में जल शासन
संवैधानिक प्रावधान
- राज्य विषय: जल मुख्यतः राज्य सूची (सातवीं अनुसूची) की प्रविष्टि 17 के अंतर्गत आता है।
- केंद्र की भूमिका: अंतरराज्यीय नदियों का विनियमन संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अंतर्गत है।
- अनुच्छेद 262: संसद को अंतरराज्यीय जल विवादों के निपटान का अधिकार देता है।
जल शासन से संबंधित प्रमुख समस्याएँ
- खंडित संस्थागत ढाँचा: राज्य सूची में होने के कारण राज्यों के बीच अधिकारों का टकराव होता है।
- अभियांत्रिकी-प्रधान दृष्टिकोण: नीतियाँ मुख्यतः बाँध, नहर आदि पर केंद्रित रही हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन की उपेक्षा होती है।
- कृषि नीतियाँ: धान और गेहूँ जैसी अधिक जल-आवश्यक फसलों को बढ़ावा देने से भूजल दोहन बढ़ा है।
- पारिस्थितिकी आधारित दृष्टिकोण का अभाव: भूमि, जल और पारिस्थितिकी के संबंधों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
- कमज़ोर आँकड़ा प्रणाली: विश्वसनीय और व्यापक जल आँकड़ों की कमी से योजना और प्रबंधन प्रभावित होता है।
- मांग प्रबंधन की उपेक्षा: आपूर्ति बढ़ाने पर अधिक ध्यान, जबकि जल उपयोग दक्षता और संरक्षण पर कम ध्यान दिया जाता है।
सरकारी पहल
- जल शक्ति अभियान (2019): जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण पर केंद्रित।
- अमृत (AMRUT) 2.0 योजना: शहरी क्षेत्रों को आत्मनिर्भर और जल-सुरक्षित बनाने का उद्देश्य।
- अमृत सरोवर मिशन: प्रत्येक जिले में 75 जल निकायों का विकास और पुनर्जीवन।
- राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (NAQUIM): जलभृतों की पहचान और प्रबंधन में सहायक।
- अटल भूजल योजना: अतिदोहन क्षेत्रों में भूजल प्रबंधन सुधार हेतु।
- जल जीवन मिशन (JJM): प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना।
- यह पहल नल के पानी के कनेक्शन के माध्यम से, नियमित और दीर्घकालिक आधार पर, निर्धारित गुणवत्ता वाला पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराती है।
निष्कर्ष
- खंडित और अभियांत्रिकी-प्रधान दृष्टिकोण से हटकर समग्र जल शासन व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता है।
- जल को एक साझा और सीमित संसाधन मानते हुए विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वित प्रबंधन आवश्यक है।
- ध्यान आपूर्ति बढ़ाने से हटाकर सततता, दक्षता और समानता पर केंद्रित किया जाना चाहिए।
स्रोत : DTE